इंद्रियों को वश में करना - परम् पूज्य अनन्त श्री विभूषित यज्ञ सम्राट महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के विचार

15 March 2019 12:08 Spiritual Desk

परम् पूज्य स्वामी श्री प्रखर जी महाराज ने प्रवचन की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इंद्रियों को वश में करना सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य में नहीं है क्योंकि मनुष्य इंद्रियों के भोग के कारण स्वयं उनके वश में है, इंद्रियों के भोग के विषयों में फंस कर मनुष्य अपने अंदर की असीमित संभावनाओं से वंचित रह जाता है। उन्होंने कहा कि विषयों से मुक्त होकर मनुष्य का चरित्र निर्माण हो सकता है, ईश्वर की आराधना एवं आध्यात्मिक शक्तियां अर्जित करके मनुष्य विषयों से मुक्त हो सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, वह सब कुछ जानता है अर्थात जो सब कुछ जानता है वही ईश्वर है। जिस पर ईश्वर की कृपा हो जाए वही आध्यात्म के माध्यम से अपने अंदर की शक्तियों को जागृत कर सकता है और सांसारिक विषयों से छुटकारा पाकर जीवन को आनन्दमय बना सकता है।

महाराज श्री ने जीवन में विकास की संभावनाओं में ऑक्सीजन की भूमिका समझाते हुए कहा कि ऑक्सीजन जैसे मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक है।

उन्होंने वैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए कहा कि किसी भी देश के विकास में उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और उद्योगों में विभिन्न वस्तुओं के निर्माण की प्रक्रिया में ऑक्सीजन महत्वपूर्ण स्थान रखती है लेकिन मैग्नीज ऑक्साइड से ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए किसी कैटेलिस्ट (उत्प्रेरक) की आवश्यकता होती है। मैग्नीज आक्साइड से ऑक्सीजन को पृथक करने के लिए जैसे पोटेशियम मरमैग्नेट रूपी उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है वैसे ही मनुष्य की आंतरिक शक्तियों को जागृत करने के लिए एक उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है और वह उत्प्रेरक आध्यात्म के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि जिस वस्तु के प्रयोग के बाद भी उसके गुण धर्म में कोई परिवर्तन न हो वही वस्तु कैटेलिस्ट अर्थात उत्प्रेरक हो सकती है। जैसे पोटेशियम परमैग्नेट के मैग्नीज ऑक्साइड में मिल जाने पर भी उसके गुण धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होता ठीक वैसे ही मनुष्य जीवन में आध्यात्म अर्थात ईश्वर आराधना के समावेश से आराधना के गुण धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होता।

उन्होंने कहा कि जो परिपक्व है वही उत्प्रेरक हो सकता है जैसे पोटेशियम परमैग्नेट अपने गुण धर्म के साथ परिपक्व है वैसे ही आध्यात्म भी अपने आप में पूर्ण है। उन्होंने साधना, आराधना अर्थात आध्यात्म को ही ईश्वर की संज्ञा दी।

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